जादुई ग्रंथ

Liber Iuratus Honorii शपथ, दर्शन, देवदूतों के पदक्रम और मुहर की एक मध्यकालीन परंपरा है। यह बाद के पोप होनोरियस से जुड़े जादुई ग्रंथ से अलग है।

ग्रंथ की अपनी कथा में एक शपथ

Liber Iuratus Honorii को प्रायः होनोरियस का शपथबद्ध ग्रंथ कहा जाता है। यह स्वयं को पवित्र जादू के सुरक्षित ज्ञान के रूप में प्रस्तुत करता है, जो सीमित संख्या में योग्य पाठकों के बीच पहुँचता है। उसकी प्रस्तावना में चर्च के अधिकारियों से संकट में पड़े जादू के साधकों की परिषद और प्रतियों को सीमित करने वाली शपथ की कथा है। यह कहानी बताती है कि रचना ने गोपनीयता और अधिकार का दावा कैसे किया। इससे परिषद के वास्तव में होने की स्वतंत्र पुष्टि नहीं होती। इस परंपरा के «होनोरियस» थीब्स के होनोरियस हैं। वे ऐसे निश्चित रूप से पहचाने गए लेखक नहीं हैं जिनके निजी दस्तावेज़ बचे हों। बाद में एक दूसरी मुद्रित रचना पोप होनोरियस का जादुई ग्रंथ नाम से प्रचलित हुई। नामों की समानता से दोनों को अक्सर गलत ढंग से एक समझ लिया जाता है। दोनों शीर्षक अलग इतिहास वाली अलग रचनाओं के हैं। शपथबद्ध ग्रंथ अपने धार्मिक ढाँचे में प्रार्थनाओं, दिव्य नामों, देवदूतों की ब्रह्मांड-व्यवस्था और ईश्वर के आनंदमय दर्शन की आशा को जोड़ता है।

सिर्फ़ अमूर्त शीर्षक के बजाय एक भौतिक पांडुलिपि-साक्ष्य

ब्रिटिश लाइब्रेरी की सूची Royal MS 17 A XLII को पंद्रहवीं शताब्दी की पांडुलिपि बताती है, जिसमें Sworne Book और अन्य जादुई ग्रंथ हैं। उसका विवरण आज दूसरे अंशों के साथ बँधे इस पांडुलिपि-ग्रंथ में पर्णों और भाषाओं का भेद बताता है। पीटरसन इस अंग्रेज़ी पांडुलिपि-साक्ष्य की तुलना Sloane 3854 सहित स्लोन पांडुलिपियों से करते हैं। वे बताते हैं कि कोई भी प्रति सभी विशेषताओं को एक जैसे रूप में नहीं रखती। बार-बार पुनरुत्पादित की जाने वाली ईश्वर की मुहर अलग प्रतियों में भिन्न हो सकती है। कुछ उल्लिखित पांडुलिपियों में आरेख नहीं है। संपादक का पुनर्निर्माण उपयोगी हो सकता है, लेकिन वह हर मध्यकालीन पाठक के सामने मौजूद वस्तु की तस्वीर नहीं है। पांडुलिपि में शामिल ग्रंथ अलग-अलग पाठ-परतें सुरक्षित रखते हैं। इसलिए कोई बाद का विस्तार या परिशिष्ट अपने आप मध्यकालीन मूल का हिस्सा नहीं है।

पाँच प्रकरण, केवल एक मुहर बनाने का विधान नहीं

रचना का अपना पाँचवाँ प्रकरण उससे पहले के चार प्रकरणों की बनावट का सार देता है। पहला दिव्य दर्शन को समर्पित है। वह इस लक्ष्य को दिव्य शक्ति के ज्ञान, पापों की क्षमा, घोर पाप से बचे रहने और शुद्धिस्थल से आत्माओं की मुक्ति से जोड़ता है। दूसरा शुभ देवदूतों और आकाशों से होकर ग्रहों और तत्वों के ज्ञान की ओर उतरता है। इसमें नाम, कार्य, वरिष्ठ शक्तियाँ, मुहरें, आह्वान, आकाशीय प्रभाव और अग्नि, जल तथा सृष्टि के अन्य भागों से जुड़ी आत्माएँ आती हैं। तीसरा वायु की आत्माओं की ओर मुड़ता है और बाँधने, मौसम, आवागमन, चोरी की वस्तु वापस पाने, मेल-मिलाप, धन, उपचार, भ्रम तथा अन्य वादा किए गए कार्यों की लंबी सूची बनाता है। चौथा पृथ्वी की आत्माओं, खज़ानों, कारागारों और प्रेत-दर्शनों की चर्चा करता है। पाँचवाँ व्यवस्था को समझाता और दोहराता है। दिव्य दर्शन से अधिकाधिक भौतिक शक्तियों तक यह अवरोह ग्रंथ का संगठन करने वाला तर्क है। आत्माओं के नामों का कोई पन्ना या एक मुहर इस अवरोह के विशेष स्तर में स्थित है। वह पूरे ग्रंथ का प्रतिनिधि नहीं है।

मुहर, प्रार्थनाएँ और आत्माओं की सूचियाँ कैसे जुड़ती हैं

ईश्वर की मुहर पहले दिव्य दर्शन की योजना में आती है। उसकी ज्यामिति, नाम और आसपास की प्रार्थनाएँ भक्ति तथा ब्रह्मांड-व्यवस्था का केंद्र बनाते हैं। ग्रंथ उसे तैयारी का स्थान लेने वाला स्वतंत्र प्रतीक नहीं बताता। आरंभ में एक महान दिव्य नाम रचा जाता है। फिर दर्शन की ओर बढ़ती दोहराई गई प्रार्थनाएँ और विनतियाँ आती हैं। इस आरोह के बाद ही दूसरा प्रकरण आकाशों, देवदूतों, ग्रह-शक्तियों, कार्यों और मुहरों की सूची देता है। तीसरा कहता है कि वायु की आत्माओं को उनके वरिष्ठों के ज्ञान के बिना बाँधा नहीं जा सकता। इसलिए हवाओं और निचली शक्तियों की उसकी लंबी सूची पहले से स्थापित पदक्रम पर निर्भर है। चौथा पृथ्वी की आत्माओं के लिए उसी प्रक्रियात्मक ढाँचे का कुछ उपयोग करता है, लेकिन नाम, मुहरें, धूप और स्थानों की व्यवस्था बदल देता है। इसमें बुलाने वाले और बुलाई गई आकृति के लिए अलग स्थान हैं। पाँचवाँ प्रकरण पिछले स्तरों की समीक्षा करके इस निर्भरता को स्पष्ट करता है। क्रम से पढ़ने पर प्रार्थना अधिकार देती है, दिव्य मुहर सर्वोच्च लक्ष्य दर्शाती है, देवदूतों और ग्रहों की सूचियाँ बीच के शासन को समझाती हैं और वायु तथा पृथ्वी वाले भाग उसी पदक्रम को अधिक व्यावहारिक दावों के अनुसार ढालते हैं।

संबंध और सीमाएँ

शपथबद्ध ग्रंथ का संबंध Ars Notoria की प्रार्थनाओं और बाद के सोलोमन-संबंधी संग्रहों से है। ये समानताएँ सूत्रों और देवदूतों के नामों के दोबारा उपयोग का पता देती हैं। इनसे रचनाएँ परस्पर बदलने योग्य नहीं बनतीं। सबसे ठोस तुलना कार्य की है। Ars Notoria प्रार्थना और आकृतियों को विद्या की शाखाओं की ओर निर्देशित करता है। शपथबद्ध ग्रंथ का पहला प्रकरण लंबे प्रायश्चित्त-क्रम को ईश्वर के दर्शन की ओर ले जाता है। इसके बाद के भाग नामों, मुहरों, वृत्तों और पदक्रम वाली शक्तियों का उपयोग कहीं अधिक व्यापक कार्य-सूची के लिए करते हैं। ग्रंथ के दिव्य दर्शन और आत्मिक साक्षात्कार पांडुलिपियों में दर्ज दावे हैं, किसी सूची द्वारा सत्यापित परिणाम नहीं। आधुनिक अंग्रेज़ी संस्करण लैटिन पांडुलिपि का अनुवाद कर सकता है, Royal के अंग्रेज़ी पाठ को लिप्यंतरित कर सकता है या कई प्रतियों के पाठ मिला सकता है। पीटरसन की समानांतर प्रस्तुति से अनुपस्थित अंश दिखाई देते हैं। आरंभिक सूची में बताए गए अनेक व्यावहारिक अध्यायों के निर्देश नहीं बचे हैं। दूसरी प्रति से लिया गया आरेख हर प्रति में मौजूद नहीं माना जा सकता। इसलिए विषयवस्तु का विश्लेषण रचना की नियोजित शृंखला और किसी एक पांडुलिपि में बचे असमान क्रम का भेद करता है।

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आगे समझने के प्रश्न

  • थीब्स के होनोरियस बाद के जादुई ग्रंथ के पोप से कैसे अलग हैं?
  • बची हुई पांडुलिपियों में प्रार्थनाएँ और आरेख अलग-अलग क्यों हैं?
  • पाँच प्रकरण दिव्य दर्शन से वायु और पृथ्वी की आत्माओं तक कैसे उतरते हैं?

स्रोत और आगे पढ़ने की सामग्री

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