मंत्र-प्रयोगों की परंपराएँ
आकर्षण के प्राचीन पाठ कई भाषाओं वाले क्षतिग्रस्त पपीरस में बचे हैं। वे इच्छा को उन वस्तुओं से जोड़ते हैं जिनका नैतिक और ऐतिहासिक संदर्भ महत्त्व रखता है।
टुकड़ों में बची एक पुस्तिका
British Museum का लंदन मैजिकल पपीरस उत्तर-प्राचीन काल की डेमोटिक पांडुलिपि है, जिसमें मंत्र और विधियाँ स्तंभों में लिखी हैं। उसकी सूची भविष्यकथन, उपचार, विष और प्रेम की सामग्री बताती है, जिसमें पीछे की सतह पर प्रेम-मंत्र भी है। संग्रह का दूसरा पपीरस यूनानी और डेमोटिक लेखन तथा वे अंश बचाता है जिन्हें संपादक प्रेम-टोटके या आकर्षण-मंत्र कहते हैं। ये संदर्भ से अलग तैरते “प्राचीन मिस्र के रहस्य” नहीं हैं। ये संग्रहालय-संख्या, आकार, टूटी सतहों, अलग लिपिकों की लिखावट और जटिल संपादन-इतिहास वाली पहचान योग्य वस्तुएँ हैं। लंदन की पांडुलिपि उन्नीसवीं शताब्दी में लंदन और लाइडेन के बीच बाँट दी गई। यह आधुनिक विभाजन मूलतः बड़े समग्र रूप में नकल किए पाठ तक आज की पहुँच को प्रभावित करता है। संग्रहालय की प्रदर्शनी-मार्गदर्शिका लंदन की सामग्री को लगभग तीसरी शताब्दी ईस्वी का बताती है और प्राचीन कॉप्टिक तथा यूनानी टिप्पणियाँ दर्ज करती है। इसीलिए “मिस्री जादू” जैसा नाम उत्तर-प्राचीन काल के बहुभाषी परिवेश को छिपा देता है।
आकर्षण का विषय नैतिक प्रश्न उठाता है
बचा हुआ सूत्र लालसा जगाने, विवाह सुनिश्चित करने या किसी को लौटने के लिए विवश करने का दावा कर सकता है। उसका होना लेखक या ग्राहक की इच्छा का साक्ष्य है, सहमति मिलने या इच्छित असर होने का नहीं। प्राचीन प्रेम-जादू में वे विषय हैं जिन्हें आधुनिक पाठक बलपूर्वक नियंत्रण मानेंगे; ऐसे अंश निर्दोष संबंध-सलाह नहीं हैं। लिखित सूत्र से यह भी सिद्ध नहीं होता कि उसे ठीक उसी तरह किया गया था। पुस्तिका विकल्प, संशोधन और नमूने जमा कर सकती है, जैसे उपचारों की पुस्तक में ऐसे नुस्खे हो सकते हैं जिन्हें किसी मालिक ने कभी आज़माया नहीं। British Museum बताता है कि एक पपीरस की व्यवस्था मिश्रित और खंडित है तथा स्तंभों का प्रभावशाली प्रकाशित क्रम अविश्वसनीय हो सकता है। इसलिए मंत्रों की सहज शृंखला की तरह दिया लोकप्रिय अनुवाद किसी विशिष्ट पपीरस, स्तंभ, भाषा और संस्करण का संपादकीय पुनर्निर्माण हो सकता है।
तुलना से क्या समझ आता है
लंदन-लाइडेन की सामग्री में प्रेम-संबंधी अंश दूसरे उद्देश्यों के पास रखे हैं। इसलिए वह किसी सनसनीखेज़ वाक्य को अलग करने से अधिक, उपयोग के लिए बनाए संग्रह के अध्ययन में सहायक है। दूसरा खंडित पपीरस दिखाता है कि यूनानी और डेमोटिक लिपियाँ साथ आ सकती हैं; भाषा, अनुवाद और लिपिकीय अभ्यास पाठ के निर्माण का हिस्सा थे। दोनों सूची-अभिलेख अलग भाषाएँ, बचे हुए रूप और उद्देश्य बताते हैं। वस्तुओं के विवरण पाठ के वादे और पुरातत्त्व के साक्ष्य का बुनियादी अंतर भी स्पष्ट करते हैं। अंश एक खास सांस्कृतिक परिवेश में लिखा और नकल किया गया था; उसका बचना किसी सफल अलौकिक परिणाम को स्थापित नहीं करता। इच्छा और नियंत्रण का नैतिक इतिहास भी अध्ययन योग्य है।
विधि का भीतरी क्रम महत्त्व रखता है
पुस्तिका की प्रविष्टि छोटे शीर्षक से अपना उद्देश्य बता सकती है, फिर सामग्री या तैयार वस्तु दे सकती है, बोले या लिखे जाने वाले नाम ला सकती है और अंत में क्रिया, वस्तु रखने का स्थान या शक्ति को संबोधित शब्द दे सकती है। यह क्रम उपयोग के लिए नकल किए भागों को आधुनिक संपादक के शीर्षक या टिप्पणी से अलग करता है। इससे यह भी दिखता है कि क्षति कहाँ सबसे अधिक अनिश्चितता लाती है। आरंभ खोने से बताया उद्देश्य मिट सकता है; बीच की पंक्ति खोने से सामग्री या देवता का नाम हट सकता है; अलग हुआ स्तंभ यह बदल सकता है कि किस सूत्र के बाद कौन-सा निर्देश आता दिखे। लंदन-लाइडेन सामग्री का यूनानी, डेमोटिक और प्राचीन कॉप्टिक मेल दिखाता है कि भाषा कार्य-संग्रह के भीतर भी बदल सकती थी, केवल बंद सांस्कृतिक परंपराओं के बीच नहीं। जमा की गई बंधन-पट्टिका लक्ष्य, माँग और भौतिक क्रिया को एक वस्तु में समेटती है। उत्तर-प्राचीन काल की पुस्तिका इसके बजाय भविष्यकथन, उपचार, विष और अन्य उद्देश्यों के साथ कई संभावित क्रियाएँ रखती है। बाद का सोलोमन-संबंधी जादुई ग्रंथ सामग्री और प्रार्थनाएँ अध्यायों में व्यवस्थित करता है। ये रूप इच्छा और बलपूर्वक नियंत्रण को लिखने का तरीका बनाते हैं, भले आधुनिक नाम तीनों को “मंत्र” कहें।
आगे समझने के प्रश्न
- बचे हुए स्तंभों में प्रेम-मंत्र दूसरी विधियों के साथ कैसे रखे गए हैं?
- क्या संपादक ने खंडों का क्रम फिर बनाया है?
- क्या पृष्ठ पाठ के दावे, सहमति और परिणाम में अंतर करता है?
