संख्या छवि से पहले क्यों आती है
पुस्तक II तावीज़ों के चित्रों से शुरू नहीं होती। आरंभिक अध्याय गणितीय ज्ञान की आवश्यकता का तर्क देते हैं। फिर वे एक, दो, तीन और आगे के संख्या-क्रमों, संख्याओं के रूपों, अंक-पद्धतियों तथा अक्षरों को दिए गए मानों पर आते हैं। इस तैयारी के बाद ही अध्याय 22 ग्रहों की सारणियाँ प्रस्तुत करता है। यह क्रम महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वर्ग का उद्देश्य अंकगणित, ग्रहों का पदानुक्रम, दिव्य नाम, बौद्धिक सत्ताएँ, आत्माएँ और रेखात्मक चिह्न एक वस्तु में जोड़ना है।
हर ग्रह को अलग कोटि का वर्ग मिलता है। शनि से शुरुआत होती है, जिसके प्रत्येक ओर तीन खाने हैं। शुक्र को सात मिलते हैं और चंद्रमा के साथ नौ पर क्रम समाप्त होता है। कोटि से खानों की संख्या, किसी पंक्ति में मिलने वाला स्थिर योग और सभी प्रविष्टियों का कुल योग निर्धारित होता है। फिर इन योगों का मिलान उन नामों से किया जाता है जिनके हिब्रू अक्षरों के संख्यात्मक मान हैं। इस तरह सारणी पूर्णांकों की व्यवस्था भी है और निर्देशांकों का ऐसा क्षेत्र भी, जिसमें नाम को रेखा में बदला जा सकता है।
संख्याओं से सारणियों की ओर यह प्रगति परिमाण को पदानुक्रम से भी जोड़ती है। सात गुणा सात की व्यवस्था आने से पहले ही सात को शुक्र से जोड़ा जाता है। फिर यह व्यवस्था सात को उनचास स्थानों, 175 के प्रति-पंक्ति योग और 1225 के कुल योग में विस्तृत करती है। अग्रिप्पा इनसे निकले मानों को ऐसी विशिष्ट पहचान मानते हैं जिनमें अलग श्रेणियों के नाम समा सकते हैं। अंकगणित भीतर की सीमाएँ देता है और ग्रह से जुड़ाव उन्हें अर्थ देता है। अकेले किसी एक पक्ष से पूरा मुद्रित संयोजन नहीं बनता।
एक ही मुद्रित पृष्ठ पर कई रेखाचित्र
1651 का शुक्र-पृष्ठ सात गुणा सात की सारणी को “मुद्राएँ या चिह्न” शीर्षक वाले समूह से अलग रखता है। यह बहुवचन महत्त्वपूर्ण है। एक आकृति वर्ग के ज्यामितीय संबंधों से निकली शुक्र की मुद्रा है, जबकि अन्य आकृतियाँ हागीएल नामक बौद्धिक सत्ता और केदेमेल नामक आत्मा को संकेतों में व्यक्त करती हैं। बाद का पुनरुत्पादन इन्हें एक ही तावीज़ के चारों ओर रख सकता है, लेकिन अग्रिप्पा का पृष्ठ सारणी से चिह्न तक पहुँचने के अलग रास्ते बनाए रखता है। ग्रह की मुद्रा और किसी नाम से खींचा गया चिह्न परस्पर संबंधित रचनाएँ हैं, एक ही आकृति के अदल-बदलकर इस्तेमाल होने वाले नाम नहीं।
कार्ल आंटोन नोवोट्नी द्वारा काष्ठचित्रों का पुनर्निर्माण यह भी दिखाता है कि प्रक्रिया पूरी तरह यांत्रिक नहीं थी। रेखाएँ अंकित खानों को जोड़ती हैं, जबकि वलय, हुक, प्रतिच्छेद या भीतर की ओर मुड़े हिस्से शुरुआत, अंत, दोहराए गए मान और स्थान-मूल्य के बदलाव दिखा सकते हैं। दहाइयों या सैकड़ों को छोटे वर्ग के भीतर उपलब्ध स्थानों तक घटाया जा सकता है। उत्कीर्णक भी पढ़ने योग्य, संतुलित आकृतियों को प्राथमिकता देता दिखाई देता है। इसलिए भिन्न या गलत रेखाएँ आरेखों के पाठ-संचरण के इतिहास का हिस्सा हैं। साफ-सुथरा आधुनिक पुनरांकन ठीक उन्हीं स्थानों को छिपा सकता है जहाँ आरंभिक मुद्रण अनियमित है।
सारणियों के बाद के अध्याय इसी विधि को विस्तृत करते हैं। ज्यामिति, संगीत का अनुपात, देह के माप, आकाशीय अवलोकन, राशि-खंड और ग्रहों की छवियाँ, सभी संबंध को रूप में बदलते हैं। इसलिए आकाशीय छवि केवल वर्ग को चित्र की तरह दोबारा बनाना नहीं है। उसमें मापे हुए सामंजस्य का दूसरा प्रकार काम करता है: सामग्री, आकृति, रंग, ग्रह, राशि का अंश और घड़ी को चुने हुए समय के अधीन समन्वित किया जाता है। वर्ग और छवि, दोनों में साम्य आवश्यक है, लेकिन उनके रेखाचित्र अलग प्रक्रियाओं से बनते हैं।
पाठ का विश्लेषण: शुक्र की 7×7 सारणी से नाम और चिह्न कैसे बनते हैं
शुक्र की सारणी की पहली पंक्ति देखें: 22 + 47 + 16 + 41 + 10 + 35 + 4 = 175। बीच की पंक्ति का योग भी 175 है, और यही योग स्तंभों तथा दोनों मुख्य विकर्णों में मिलता है। उनचास खानों में 1 से 49 तक के पूर्णांक हैं, जिनका कुल योग 1225 है। अग्रिप्पा 49, 175 और 1225 को शुक्र की संख्याएँ मानते हैं: वर्ग में खानों की संख्या, प्रति-पंक्ति स्थिर योग और कुल योग। साथ दिए नाम-क्रम में हागीएल के हिब्रू अक्षरों के मानों का योग 49 है, जबकि केदेमेल के मानों का योग 175 है। इसलिए दोनों नाम एक ही वर्ग के दो अलग संख्यात्मक आयामों को भरते हैं।
चिह्न बनाने के लिए अक्षरों के क्रमिक मानों के अनुरूप खानों का अनुसरण करके उन स्थानों को जोड़ा जाता है। हागीएल को 1–49 की सीमा में खींचा जा सकता है। केदेमेल के लिए वह परिपाटी चाहिए जो 100 जैसे मान को स्थान-मूल्य के आधार पर उपयोगी स्थान में बदलती है। यह विधि नाम और उसके कोणीय चिह्न के पारिवारिक साम्य को समझाती है, लेकिन यह नहीं मानती कि हर रेखा अनिवार्य थी। इससे एक त्रुटि भी सामने आती है: नोवोट्नी की गणना में बने सेराफ़िम को दी गई आकृति का योग 1252 है, शुक्र के लिए आवश्यक 1225 नहीं। इस पृष्ठ की अंकगणित, नाम-पद्धति, रेखांकन-परिपाटियों और त्रुटि को साथ पढ़ने पर सबसे अधिक जानकारी मिलती है। वर्ग चिह्नों के लिए ढाँचा बनाता है, जबकि बचा हुआ काष्ठचित्र उसी ढाँचे के भीतर मानवीय चुनाव और गलतियाँ दर्ज करता है। चिह्नों के पास की संख्याएँ पढ़ने से वह प्रक्रिया दिखाई देती है जो चिह्न की अलग की गई आधुनिक छवि में छिपी रहती है।
स्रोतों के अभिलेख
- फ़्राइबुर्ग विश्वविद्यालय पुस्तकालय, कोलोन का 1533 मुद्रण (B 613) ↗
- 1651 का अनुवाद, पुस्तक II की अध्याय-सूची ↗
- 1651 का स्कैन, शुक्र की सारणी और चिह्नों वाला पुस्तक II का पृष्ठ ↗
- कार्ल आंटोन नोवोट्नी, अग्रिप्पा की मुद्राओं और चिह्नों की रचना (1949) ↗
- बाज़ेल विश्वविद्यालय पुस्तकालय, 1550 के संस्करण की विषय-सूची ↗
