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अथर्ववेद · धन

अपनी माँगी हुई कीमत पर बेचना: III.15 में व्यापारी का जोखिम

एक सजावटी चाँदी का चंद्र-चक्र, बिना अंशांकन वाले पीतल के वलय और नील रंग की पुस्तक।

अपनी माँगी कीमत पर बेचने के मंत्र का खोज-वाक्य प्रस्तावित बिक्री की ओर संकेत करता है, बकाया ऋण की ओर नहीं। अथर्ववेद III.15 अधिक सीधी ऐतिहासिक तुलना है, क्योंकि उसमें सौदे, बिक्री और बदले में होने वाले लेन-देन का नाम आता है; योजना में ऋण का आधार बनाया गया VI.117 मुख्यतः अंतर समझने के काम आता है। आज की माँगी कीमत वह राशि है जो विक्रेता समझौते से पहले तय करता है। प्राचीन व्यापारी अनुकूल शर्तें चाहता है, लेकिन सूक्त कहीं खरीदार से किसी बताई गई राशि को स्वीकार करना अनिवार्य नहीं करता।

ग्रंथ · अथर्ववेद

इस लेख में विवेचित सूक्त

यहाँ दिए मंत्रों से शुरुआत करें। उनकी छवियों और उद्देश्यों की तुलना के लिए उल्लिखित अन्य सूक्त खोलें।

III.15

अथर्ववेद · कांड III मुख्य विवेचन

व्यापार में सफलता के लिए

  1. मैं व्यापारी इंद्र को प्रेरित करता हूँ (cud); वे हमारे पास आएँ, हमारे आगे चलें; कृपण और राह में घात लगाए जंगली पशु को [दूर] हटाकर, शक्ति (īç) से युक्त वे मुझे धन देने वाले हों।

  2. देवताओं द्वारा चले गए वे अनेक मार्ग, जो स्वर्ग और पृथ्वी के बीच विचरण करते हैं (sam-car), मुझे दूध और घी से तृप्त करें, ताकि लेन-देन करते हुए (krī) मैं धन प्राप्त करूँ (ā-hṛ)।

  3. हे अग्नि, ईंधन और घी के साथ, अभिलाषा रखते हुए मैं स्फूर्ति (táras) और बल के लिए आहुति देता हूँ; जहाँ तक मुझसे संभव है, स्तुतिपाठ (bráhman) से आदर करते हुए, सौ गुनी प्राप्ति के लिए यह दिव्य प्रार्थना (dhī́) अर्पित करता हूँ।

  4. हे अग्नि, हमारे इस अपराध (? çaráṇi) को सह लें (mṛṣ), कि हम इतने दूर के मार्ग पर गए हैं। हमारे लिए सौदा और बिक्री सफल हों (çuná); बदले में होने वाला लेन-देन मेरे लिए फलदायी हो; आप दोनों एकमत होकर इस आहुति का आनंद लें; हमारा घूमना और उठना सफल हो।

III.15 के शेष 4 मंत्र पढ़ें
  1. हे देवताओं, जिस धन से मैं सौदा करता हूँ (car), धन से धन चाहता हूँ, वह मेरे लिए अधिक हो, कम नहीं; हे अग्नि, आहुति से लाभ नष्ट करने वाले देवताओं को रोक दें (ni-sidh)।

  2. हे देवताओं, जिस धन से मैं सौदा करता हूँ, धन से धन चाहता हूँ, उसमें इंद्र मुझे सुख (? rúci) दें, प्रजापति, सवितृ, सोम और अग्नि भी दें।

  3. हे पुरोहित वैश्वानर ('सभी मनुष्यों के लिए'), हम नमस्कार सहित आपकी स्तुति करते हैं; आप हमारी संतति, स्वयं हमारी, हमारी गायों और हमारे प्राणों की रक्षा करें।

  4. हे जातवेदस्, जिस तरह खड़े घोड़े के लिए लाते हैं, वैसे ही हम प्रतिदिन आपके लिए निरंतर लाते रहें; धन और अन्न की प्रचुरता में साथ आनंदित होते हुए, हे अग्नि, आपके पड़ोसी हम किसी हानि से बचे रहें।

व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर III.15 पढ़ें ↗

VI.117

अथर्ववेद · कांड VI तुलना में उल्लिखित

दोष या ऋण से मुक्ति के लिए

तुलनात्मक सूक्त VI.117 पढ़ें (3 मंत्र)
  1. जो उधार लिया हुआ मैं खाता हूँ (?) और जो लौटाया नहीं गया है; यम का जो कर मैं लिए फिरता हूँ, अब, हे अग्नि, उसके विषय में मैं दोषमुक्त होता हूँ (anṛṇá); आप जानते हैं कि सभी बंधन कैसे खोले जाते हैं।

  2. यहीं रहते हुए हम उसे वापस देते हैं; जीवित रहते हुए जीवितों के लिए उसका भुगतान करते हैं (ni-hṛ); उधार लेकर जो अन्न मैं खा गया हूँ, अब, हे अग्नि, उसके विषय में मैं दोषमुक्त होता हूँ।

  3. इस [लोक] में दोषमुक्त, ऊपरी लोक में दोषमुक्त और तीसरे लोक में हम दोषमुक्त हों; देवताओं और पितरों द्वारा चले गए लोकों में, सभी मार्गों पर हम दोषमुक्त रहें।

व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर VI.117 पढ़ें ↗

कीमत से पहले रास्ता आता है

III.15 की शुरुआत इस निवेदन से होती है कि व्यापारी के रूप में कल्पित इंद्र आगे चलें और कृपण तथा खतरनाक पशु से मार्ग साफ़ करें। दूसरा मंत्र अनेक मार्गों का आह्वान करता है और लेन-देन से धन प्राप्त करने की आशा रखता है। ये शुरुआती चरण दिखाते हैं कि व्यापार केवल लाभ की मौखिक इच्छा क्यों नहीं है: सामान और लोगों को यात्रा करनी, मिलना और अनिश्चितता के बीच बचना पड़ता है। ऑनलाइन बिक्री-सूची इस्तेमाल करने वाले विक्रेता के खतरे अलग हैं, लेकिन पुरानी कविता का क्रम फिर भी याद दिलाता है कि माँगी कीमत अपने-आप कोई लेन-देन नहीं करा सकती। खरीदार तक रास्ता और ऐसा सौदा होना चाहिए जिसके लिए दोनों पक्ष तैयार हों।

सौदा एक संबंध है

मंत्र 4 में वक्ता सौदे और बिक्री की सफलता तथा बदले में होने वाले लेन-देन के फलदायी होने की इच्छा रखता है। मंत्र 5 आशा करता है कि सौदे में लगाई संपत्ति घटने के बजाय बढ़ेगी। सौदा पाने की कोशिश ही बताती है कि उसका परिणाम पहले से तय नहीं है। व्हिटनी की टिप्पणी मंत्र 4 की एक पाठगत समस्या और प्रतिफल संबंधी उसकी भाषा के वैकल्पिक अनुवाद पर भी चर्चा करती है, इसलिए उससे एक ही कीमत सुनिश्चित करने की कठोर तकनीक निकालना असावधानी होगी। कविता अच्छे व्यापारिक परिणाम की प्रार्थना करती है। वह विक्रेता के राशि बोलते ही खरीदार के अपने-आप मान लेने का वर्णन नहीं करती। आज का वाक्यांश माँगी कीमत एक पक्ष की शुरुआती स्थिति व्यक्त करता है।

ऋण की शुरुआत दूसरी घटना के बाद होती है

VI.117 उस चीज़ से संबंधित है जो उधार ली गई और लौटाई नहीं गई। उसका दूसरा मंत्र जीवित रहते हुए उधार का अन्न लौटाने की बात करता है। यह ऐसा संबंध है जिसमें दायित्व पहले से मौजूद है। बिक्री पर सहमति बनने से पहले कोई खरीदार विक्रेता को माँगी कीमत देने का ऋणी नहीं है। खरीदार स्वीकार करके भुगतान न करे, तो स्थिति बदलती है और ऋण चुकाने की भाषा अधिक प्रासंगिक होती है। समय का यही अंतर ऋण वाले सूक्त को मुख्य स्रोत के बजाय तुलना के रूप में शामिल करने का प्रमुख विश्लेषणात्मक कारण है। सौदेबाज़ी को ऋण से मिला देना झूठा संकेत देगा कि जिस किसी को कीमत दिखाई गई, वह उसे देने का वादा पहले ही कर चुका है।

आज के विक्रेता की इच्छा

साथ दिया मंत्र चाहता है कि ग्राहक विक्रेता की माँगी कीमत चुकाए। यह आज की एक मौलिक मंशा है; दोनों प्राचीन सूक्तों में से कोई तय खुदरा कीमत, ऑनलाइन बिक्री-सूची या स्वीकार करने को बाध्य ग्राहक को परिभाषित नहीं करता। सही संबंध यह है कि III.15 बिक्री की अनिश्चितता को गंभीरता से लेता है और व्यापारिक प्रयास के बाद लाभ माँगता है। सही सीमा यह है कि अनुकूल सौदे में मोलभाव, इनकार या दूसरी राशि भी शामिल हो सकती है। वैदिक संदर्भ जानने वाला पाठक सीख सकता है कि सूक्त मार्ग, भेंट और वापसी को किस क्रम में रखता है। उसे यह नहीं बताया जाना चाहिए कि ग्रंथ किसी खास खरीदार की पेशकश की भविष्यवाणी करता है या आज के किसी मूल्यांकन को प्रमाणित करता है।

उदाहरण सहित व्याख्या: सहमति से पहले और बाद में

एक कुम्हार पात्र के लिए दस इकाइयाँ माँगता है। खरीदार उस पर विचार कर रहे हों, तब III.15 उपयुक्त तुलना है: बिक्री की आशा है और कीमत पर मोलभाव हो सकता है। VI.117 उपयुक्त नहीं है, क्योंकि अभी न किसी ने पात्र उधार लिया है, न कुम्हार का कुछ देना है। कोई खरीदार दस इकाइयाँ स्वीकार करके पात्र ले जाए और बाद में भुगतान न करे, तो स्थिति अधूरे दायित्व की ओर बढ़ती है और VI.117 उसे अधिक स्पष्ट करता है। वही वस्तु दो आर्थिक चरणों से गुज़र सकती है। आज का मंत्र पहले चरण, यानी विक्रेता की चुनी कीमत पर सहमति की आशा, से संबंधित है।

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