पाराशरी ग्रह दृष्टि का स्पष्ट संदर्भ: सात पूर्ण सातवीं दृष्टियाँ, छह विशेष पूर्ण दृष्टियाँ और राशि पर दृष्टि तथा उसमें स्थित ग्रह पर दृष्टि का अंतर।
पूर्ण दृष्टि का शास्त्रीय नियम
बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय 26, श्लोक 2–5 में ऋषि पहले बताई राशि आधारित दृष्टियों और ग्रह दृष्टियों में अंतर करते हैं। अंश हर ग्रह को पूर्ण सातवीं दृष्टि, फिर शनि, बृहस्पति और मंगल को दो-दो अतिरिक्त विशेष दृष्टियाँ देता है। साइट उस पूर्ण दृष्टि अंश को केवल सात पारंपरिक दृश्य ग्रहों पर लगाती है। श्लोक का लिप्यंतरित पाठ-साक्ष्य मूल संस्कृत की अनुवाद से तुलना करने देता है।
| ग्रह | पूर्ण दृष्टि स्थान | विशेष स्थान |
|---|---|---|
| सूर्य | 7 | - |
| चंद्रमा | 7 | - |
| मंगल | 4, 7, 8 | 4, 8 |
| बुध | 7 | - |
| बृहस्पति | 5, 7, 9 | 5, 9 |
| शुक्र | 7 | - |
| शनि | 3, 7, 10 | 3, 10 |
गिनती में आरंभ शामिल है: ग्रह की राशि पहली, अगली दूसरी, और इसी तरह आगे। लक्ष्य राशि सूचकांक के लिए ग्रह के राशि सूचकांक में बताए स्थान से एक कम जोड़ें और मीन के बाद फिर मेष से गिनें। परिणाम मूल ग्रह से लक्ष्य राशि की ओर दिशायुक्त दृष्टि है। लक्ष्य राशि में स्थित ग्रह भी लक्ष्य ग्रह के रूप में दिया जाता है।
गणना उदाहरण
बृहस्पति को मेष में रखें। मेष पहली राशि, वृषभ दूसरी, मिथुन तीसरी, कर्क चौथी, सिंह पाँचवीं, कन्या छठी, तुला सातवीं, वृश्चिक आठवीं और धनु नौवीं है। बृहस्पति सिंह, तुला और धनु पर पूर्ण दृष्टि डालता है। चंद्रमा सिंह में हो तो परिणाम बृहस्पति → चंद्रमा देता है। यह तीर चंद्रमा → बृहस्पति सिद्ध नहीं करता; सिंह से चंद्रमा की अपनी पूर्ण सातवीं दृष्टि कुंभ में पड़ती है।
मंगल को मिथुन में रखें। मिथुन को पहली गिनने पर चौथी दृष्टि कन्या, सातवीं धनु और आठवीं मकर में पड़ती है। शनि को मकर में रखें: उसकी तीसरी दृष्टि मीन, सातवीं कर्क और दसवीं तुला में जाती है। पूर्ण राशि भाव के नाम लग्न से दूसरी गिनती हैं: मेष लग्न में तुला भाव 7 है; कर्क लग्न में तुला भाव 4 है। दृष्टियाँ तब भी तुला में ही पड़ती हैं।
इस गणना के बाहर क्या है?
यह पूर्ण राशि दृष्टियों की निर्देशिका है। अध्याय 26 स्तरानुसार या डिग्री के प्रति संवेदनशील दृष्टि मूल्यांकन भी बताता है। गणक वे आंशिक बल, दृग्बल या प्रभाव-सीमा आधारित ज्यामिति नहीं निकालता। वह जैमिनि राशि दृष्टि नहीं लगाता, जिसका राशि संबंध अलग है, और राहु, केतु, यूरेनस, नेपच्यून या प्लूटो को दृष्टि नहीं देता। कुछ आधुनिक परंपराएँ चंद्र-पातों को दृष्टियाँ देती हैं; वे अलग हो सकती हैं और सात-ग्रह नियम में चुपचाप मिलाने के बजाय यहाँ छोड़ी गई हैं।
इस तालिका में एक राशि साझा करने वाले ग्रह युति में हैं, एक-दूसरे पर दृष्टि में नहीं। ग्रह खाली राशि पर दृष्टि डाल सकता है; लक्ष्य ग्रह न होने पर भी राशि तालिका उसे दर्ज करती है। विशेष दृष्टियाँ दिशायुक्त हैं, इसलिए राशियों के एक ही जोड़े में दो ग्रहों का एक-दूसरे पर दृष्टि डालना आवश्यक नहीं।
जन्म मोड साइट की स्वतंत्र D1 राशि कुंडली और अनुमानित लाहिड़ी अयनांश लेता है। लग्न के लिए भरा ऐतिहासिक UTC अंतर और सही जन्मस्थान चाहिए। राशि सीमा के पास जन्म समय या अयनांश में छोटा बदलाव लक्ष्य राशि बदल सकता है। मैनुअल मोड मानता है कि आठों इनपुट की राशियाँ पहले से ज्ञात हैं; वह उनके स्रोत की जाँच नहीं कर सकता।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या हर ग्रह अपनी सातवीं राशि पर दृष्टि डालता है?
हाँ, पूर्ण पाराशरी ग्रह दृष्टि की इस पद्धति में। सातों पारंपरिक ग्रहों की सातवीं दृष्टि है; मंगल, बृहस्पति और शनि की दो-दो विशेष पूर्ण दृष्टियाँ भी हैं।
क्या ग्रह दृष्टि और राशि दृष्टि एक हैं?
नहीं। यह मार्गदर्शिका अध्याय 26 का ग्रह दृष्टि नियम लेती है। राशि दृष्टि का अपना राशि आधारित आवंटन है और उसकी गणना तथा पहचान अलग होनी चाहिए।
राशि तो दिखती है, लेकिन लक्ष्य ग्रह क्यों नहीं?
सात पारंपरिक ग्रहों में से कोई वहाँ न हो तब भी ग्रह पूरी राशि पर दृष्टि डालता है। लक्ष्य ग्रह तभी दिखता है जब उसकी D1 निरयण राशि उस दृष्ट राशि से मिलती है।
तीर पारस्परिक क्यों नहीं है?
हर ग्रह की अपनी बाहर जाने वाली दृष्टि सूची है। मंगल या बृहस्पति की विशेष दृष्टि दूसरे ग्रह पर पड़ सकती है, जबकि उस ग्रह की अपनी दृष्टि वापस मूल ग्रह पर न पड़ती हो।
स्रोत और गणना
- बृहत्पाराशर होराशास्त्र, अध्याय 26, श्लोक 2–5 (PDF पृष्ठ 37): पूर्ण सातवीं दृष्टि और मंगल, बृहस्पति, शनि के विशेष स्थान।
- अध्याय 26 श्लोक 4 का संस्कृत पाठ और अनुवाद: संक्षिप्त पूर्ण दृष्टि नियम का तुलनात्मक पाठ-साक्ष्य।
- D1 राशि कुंडली की विधि: जन्म मोड की निरयण स्थितियाँ, लग्न और भाव के नाम।
