ग्रंथ · अथर्ववेद
इस लेख में विवेचित सूक्त
यहाँ दिए मंत्रों से शुरुआत करें। उनकी छवियों और उद्देश्यों की तुलना के लिए उल्लिखित अन्य सूक्त खोलें।
अथर्ववेद · कांड II मुख्य विवेचन
स्त्री का प्रेम पाने के लिए
जैसे यहाँ हवा धरती से घास को झकझोरती है, वैसे ही मैं तुम्हारे मन को झकझोरता हूँ, ताकि तुम मुझसे प्रेम करने वाली बनो, मुझसे दूर न जाने वाली बनो।
हे अश्विनो, आप दोनों साथ ले चलें और [उसे] उस पुरुष से मिलाएँ जो उससे प्रेम करता है। तुम (दोनों) के भाग्य (bhága) मिल गए हैं, [तुम्हारे] संकल्प मिल गए हैं, [तुम्हारे] आचरण (vratá) एक हो गए हैं।
उकाब जो कहना चाहते [हैं], जो रोगमुक्त हैं वे जो कहना चाहते [हैं], वहाँ वह मेरे आह्वान पर आए, जैसे बाण की नोक उसके गले (kúlmala) से जुड़ती है।
जो भीतर [था], वह बाहर [हो]; जो बाहर [था], वह भीतर [हो]; हे वनस्पति, अनेक रूपों वाली युवतियों के मन को पकड़ लो।
II.30 का शेष 1 मंत्र पढ़ें
पति की इच्छा करती यह स्त्री यहाँ आई है; पत्नी की इच्छा करता मैं आया हूँ; ज़ोर से हिनहिनाते (krand) घोड़े की तरह मैं सौभाग्य के साथ आया हूँ।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर II.30 पढ़ें ↗
अथर्ववेद · कांड VII तुलना में उल्लिखित
सभा में सफलता के लिए
तुलनात्मक सूक्त VII.12 (13) पढ़ें (4 मंत्र)
प्रजापति की दोनों पुत्रियाँ, सभा (sabhā́) और समागम (sámiti), एकमत होकर मेरा पक्ष लें; मैं जिससे मिलूँ, वह मेरी सहायता (? upa-çikṣ) करना चाहे; हे पितरों, एकत्र हुए लोगों के बीच मैं प्रिय लगने वाली बात कह सकूँ।
हे सभा, हम आपका नाम जानते हैं; सचमुच आपका नाम खेल (naríṣṭā) है; जो भी आपकी सभा में बैठने वाले हैं, वे मेरे साथ समान वाणी वाले हों।
साथ बैठे इन लोगों का तेज और विवेक (vijñā́na) मैं अपने लिए लेता हूँ; हे इंद्र, इस पूरे समागम (saṁsád) के सौभाग्य का मुझे अधिकारी (bhagín) बनाएँ।
तुम्हारा जो मन दूर चला गया है, जो यहाँ या यहाँ बँधा है, उसे हम इस ओर मोड़ते हैं; तुम्हारा मन मुझमें ठहरे।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर VII.12 (13) पढ़ें ↗
अथर्ववेद · कांड I तुलना में उल्लिखित
प्रेम-मंत्र: मीठी वनस्पति के साथ
तुलनात्मक सूक्त I.34 पढ़ें (5 मंत्र)
यह वनस्पति मधु (mádhu) से जन्मी है; मधु से हम तुम्हें खोदते हैं; मधु से तुम उत्पन्न हुई हो; ⌊वैसे⌋ हमें मधु से युक्त करो।
मेरी जीभ की नोक पर मधु, जीभ की जड़ पर मधुरता; तुम पूरी तरह मेरे वश (krátu) में हो सको, मेरे अभिप्राय (cittá) के अनुसार आ सको।
मेरा भीतर आना मधुमय (mádhumant) [है], बाहर जाना मधुमय है; अपनी वाणी से मैं मधुमय बोलता हूँ; मेरा रूप मधुमय हो।
मुझमें मधु से अधिक मिठास (mádhu), मधु-वनस्पति से अधिक मधुरता है; तुम्हारा स्नेह सचमुच मुझ पर होगा (? van), जैसे मधुमय शाखा पर।
परस्पर द्वेष न होने के लिए मैंने घेरने वाले (paritatnú) गन्ने के साथ तुम्हारी परिक्रमा की है, ताकि तुम मुझसे प्रेम करो, मुझसे दूर न जाओ।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर I.34 पढ़ें ↗
II.30 मन को झकझोरने के बाद पुकारता है
पहला मंत्र स्त्री के मन पर वक्ता की क्रिया की तुलना घास को हिलाती हवा से करता है। दूसरा अश्विनों से जोड़े को मिलाने को कहता है। मंत्र 3 में उसके पुकारने पर स्त्री के आने की कल्पना है, जिसके अंत में तीर के हिस्से की उपमा है; व्हिटनी चेताते हैं कि इस मंत्र का आरंभिक आधा भाग कठिन है और उसके बहुत अलग अनुवाद हुए हैं। फिर मंत्र 4 वनस्पति से मन को पकड़ लेने को कहता है। यह क्रम पुकार को ज़ोरदार पीछा करने का एक हिस्सा बनाता है। यह इस बात का प्रमाण नहीं कि स्त्री अपनी इच्छा से भविष्य में संपर्क का साधन चाहती है। कविता में ऐसा दोतरफ़ा आदान-प्रदान नहीं है जिसमें संबोधित स्त्री वक्ता से पूछे कि उससे संपर्क कैसे किया जाए।
सार्वजनिक संबोधन निजी संपर्क से अलग है
VII.12 (13) सभा में अनुकूलता चाहता है। उसका पहला मंत्र सभा और समिति से वक्ता को स्वीकार करने की प्रार्थना करता है और वहाँ एकत्र लोगों के बीच प्रिय बातें कहना चाहता है। दूसरा चाहता है कि सभा के सदस्यों की वाणी उसके साथ एक हो। आज का पाठक इस सार्वजनिक आत्म-प्रस्तुति की तुलना नंबरों के आदान-प्रदान से पहले के क्षण से कर सकता है, जब दो लोग पहली बार किसी समूह में बातचीत करते हैं। लेकिन प्राचीन सूक्त के श्रोता संस्थागत और सामूहिक हैं; यह किसी विशेष प्रशंसक की निजी बातचीत को कहीं और ले जाने की प्रार्थना नहीं है। उसके अंतिम मंत्र का भटकते मनों को वापस वक्ता की ओर मोड़ने का प्रयास भी इसे बिना दबाव का सामाजिक आकर्षण भर मानने में बाधा डालता है।
मीठी वाणी का भी अपना उद्देश्य है
I.34 अधिक मैत्रीपूर्ण लग सकता है: मधु पौधे से वक्ता की जीभ, आवाज़, प्रवेश, प्रस्थान और रूप तक पहुँचता है। व्हिटनी बाद में वाद-विवाद और विवाह में इसके उपयोग बताते हैं। कविता अलग-अलग मुलाकातों में प्रिय लगने वाली उपस्थिति का सजीव रूप देती है। फिर भी मंत्र 2 चाहता है कि दूसरा व्यक्ति वक्ता के संकल्प के अधीन आए और मंत्र 5 चाहता है कि वह दूर न जाए। इसे केवल सहज संपर्क योग्य बनने की सलाह नहीं माना जा सकता। II.30 के मन को झकझोरने और VII.12 की सार्वजनिक अनुकूलता की तुलना में I.34 प्रतिक्रिया को प्रभावित करने की कल्पना का एक और प्राचीन तरीका दिखाता है। कोई भी किसी व्यक्ति का नंबर माँगने का निर्णय दर्ज नहीं करता और न उस आदान-प्रदान का अर्थ बताता है।
पेश किया गया नंबर आज का प्रसंग है
“जिस व्यक्ति की मुझे चाह है, उससे मेरा नंबर माँगने की पहल करवाएँ” और पेश किया गया नंबर आधुनिक कल्पनाएँ हैं। फ़ोन नंबर रोका, दिया या माँगा जा सकता है; संबंध में उसका मूल्य उस चुनाव पर निर्भर करता है। उद्धृत सूक्तों में टेलीफ़ोन, संपर्क का स्थायी माध्यम या आगे संपर्क होने की गारंटी नहीं है। उनकी तुलना फिर भी तीन अलग चरण पहचान सकती है जिन्हें आज का डेटिंग व्यवहार कभी-कभी एक साथ समेट देता है: लोगों के बीच अच्छा बोलना, वांछित व्यक्ति को अपनी ओर बुलाना और उसका ध्यान लगातार चाहना। प्राचीन अंश यह स्थापित नहीं करते कि कोई खास व्यक्ति अगला कदम शुरू करेगा। ठीक इसी लाभ को पुराना वैदिक वादा बताना तकनीक और कविताओं की सामाजिक तर्क-प्रणाली, दोनों का गलत वर्णन होगा।
उदाहरण सहित व्याख्या
पुकार को उसके आसपास के मंत्रों के साथ पढ़ें
II.30.3 में पुकार है, लेकिन उसे मंत्र 1 के झकझोरे गए मन और मंत्र 4 की मनों को पकड़ने का आदेश पाती वनस्पति के बीच रखें। तब पुकार स्त्री को दूसरी दिशा में मोड़ने की रणनीति का हिस्सा बन जाती है, संपर्क की तटस्थ प्रार्थना नहीं। VII.12.1 से तुलना करें, जहाँ वक्ता पूरे समागम से प्रिय बातें कहना चाहता है, और I.34.3 से, जहाँ वक्ता की अपनी आवाज़ मधु जैसी है। प्रत्येक मंत्र वाणी को वांछित व्यक्ति से अलग दूरी पर रखता है। कोई भी संबोधित व्यक्ति को भविष्य में संपर्क माँगने की पंक्ति नहीं देता। ठीक उसी अनुपस्थित पंक्ति की कल्पना आज का नंबर माँगने का प्रसंग करता है।
