ग्रंथ · अथर्ववेद
इस लेख में विवेचित सूक्त
यहाँ दिए मंत्रों से शुरुआत करें। उनकी छवियों और उद्देश्यों की तुलना के लिए उल्लिखित अन्य सूक्त खोलें।
अथर्ववेद · कांड VI मुख्य विवेचन
पुरुष का प्रेम पाने के लिए
अप्सराओं का यह प्रेम (smará) [है], रथ-विजयी, रथ-विजयी से संबंधित: हे देवताओं, प्रेम भेजो; वह [पुरुष] मेरे लिए जले (anu-çuc)।
वह [पुरुष] मुझसे प्रेम करे (smṛ); प्रिय होकर, वह मुझसे प्रेम करे: हे देवताओं, भेजो आदि आदि।
कि वह [पुरुष] मुझसे प्रेम करे, कभी भी मैं उससे न करूँ, हे देवताओं, भेजो आदि आदि।
हे मरुतो, [उसे] उन्मत्त करो (un-māday-); हे अंतरिक्ष, [उसे] उन्मत्त करो; हे अग्नि, तुम [उसे] उन्मत्त करो; वह [पुरुष] मेरे लिए जले।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर VI.130 पढ़ें ↗
अथर्ववेद · कांड VI तुलना में उल्लिखित
स्त्री से प्रेम करवाने के लिए उसे विवश करना
तुलनात्मक सूक्त VI.139 पढ़ें (5 मंत्र)
न्यस्तिका (Nyastikā́) बनकर तुम उगी हो, मेरा सौभाग्य बनाने वाली; तुम्हारे आगे फैलने वाले सौ [हैं], नीचे फैलने वाले तैंतीस हैं। इस हज़ार पत्तों वाली [वनस्पति] से मैं तुम्हारा हृदय सुखाता हूँ।
मेरे कारण तुम्हारा हृदय सूख जाए, फिर [तुम्हारा] मुँह सूख जाए; फिर मुझसे प्रेम करके तुम सूख जाओ; फिर सूखे मुँह घूमो।
मेल कराने वाली, प्रेम जगाने वाली (?) बनकर, हे भूरी, सुंदर, साथ धकेलो; उस स्त्री और मुझे, दोनों को साथ धकेलो; [हमारा] हृदय एक जैसा करो।
जैसे पानी न पीने वाले का मुँह सूख जाता है, वैसे मुझसे प्रेम करके तुम सूख जाओ, फिर सूखे मुँह घूमो।
जैसे नेवला साँप को काटकर अलग करने के बाद फिर जोड़ देता है, वैसे हे शक्तिशाली [वनस्पति], प्रेम में बिछुड़े हुओं को जोड़ दो।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर VI.139 पढ़ें ↗
अथर्ववेद · कांड III तुलना में उल्लिखित
मेल के लिए
तुलनात्मक सूक्त III.30 पढ़ें (7 मंत्र)
मैं तुम्हारे लिए हृदय की समानता, मन की समानता और द्वेष का अभाव रचता हूँ; तुम एक-दूसरे के प्रति स्नेह दिखाओ (hary), जैसे अवध्य [गाय] अपने नवजात बछड़े के प्रति दिखाती है।
पुत्र पिता का आज्ञाकारी हो, माँ के साथ एकमन हो; पत्नी पति से मधु से भरे, कल्याणकारी वचन (vā́c) बोले।
भाई भाई से द्वेष न करे, न बहन बहन से; एकमत (samyáñc) और समान आचरण वाले होकर तुम शुभ भाव से (bhadráyā) वचन बोलो।
जिस मंत्र के प्रभाव से देवता अलग नहीं होते, न परस्पर द्वेष करते हैं, वह हम तुम्हारे घर में करते हैं, [तुम्हारे] मनुष्यों (púruṣa) के लिए मेल।
वरिष्ठों से युक्त (jyā́yasvant), उद्देश्य पर टिके हुए तुम बँटो मत; साथ पूरा करते हुए, साझे श्रम (sádhura) से आगे बढ़ो; एक-दूसरे को प्रिय लगने वाली बात कहते हुए यहाँ आओ; मैं तुम्हें एकजुट (sadhrīcī́na), एकमन करता हूँ।
तुम्हारा जलपान (prapā́) एक [हो], भोजन में तुम्हारा हिस्सा साझा हो; मैं तुम्हें एक ही जुए (yóktra) में साथ जोड़ता ⌊yuj⌋ हूँ; पहिए के केंद्र के चारों ओर तीलियों की तरह एकजुट होकर अग्नि की उपासना करो।
[अपने] मेल कराने से मैं तुम सभी को एकजुट, एकमन, एक समूह का बनाता हूँ; अमरत्व (amṛ́ta) की रक्षा करने वाले देवताओं जैसे [बनो]; देर और सवेरे तुम्हारा सद्भाव बना रहे।
व्हिटनी–लैनमन के मुद्रित अनुवाद (1905) का हिंदी रूप · विकिस्रोत पर III.30 पढ़ें ↗
VI.130 कामना की माँग है
पहला मंत्र स्मर (smara) को ऐसे सूक्त में लाता है जो देवताओं से प्रेम भेजने की प्रार्थना करता है ताकि एक पुरुष वक्ता के लिए जले। अगले मंत्र अनुरोध दोहराते हैं और अंतिम मंत्र मरुतों, अंतरिक्ष तथा अग्नि के आह्वान से उसे तीव्र करता है। उसका स्वर पुरुष में पैदा किए जाने वाले वांछित प्रभाव की ओर देखता है, पीछे किसी दोनों को ज्ञात घटना की ओर नहीं। मंत्र 3 असंतुलन को रेखांकित करता है: पुरुष वक्ता से प्रेम करे, बदले में समान प्रेम मिले बिना। किसी भी ऐतिहासिक व्याख्या में यह विशेषता निर्णायक है। जब पद्य की वास्तविक माँग जलता हुआ लगाव है, तब केवल प्रेम या स्मरण से जुड़े संस्कृत शब्द से स्नेहपूर्ण साझी याद का आधुनिक विचार नहीं निकाला जा सकता।
VI.139 बिछोह की अलग कल्पना करता है
VI.139 वनस्पति और लालसा से प्रिय के हृदय तथा मुँह को सुखाने की प्रार्थना से शुरू होता है। बाद में वह भूरी, सुंदर शक्ति से दो लोगों को मिलाने और उनके हृदय एक जैसे करने को कहता है। अंतिम मंत्र बिछड़े प्रेमियों को मिलाने की तुलना नेवले के साँप को काटकर अलग करने के बाद फिर जोड़ने से करता है। व्हिटनी स्पष्ट रूप से चेताते हैं कि नेवले की क्रिया प्राकृतिक इतिहास नहीं है; वह सूक्त के असाधारण काव्यात्मक दावे का हिस्सा है। कविता बिछोह और पुनर्मिलन के बारे में है, पर वह अतीत के किसी खास पल को मन में नहीं बुलाती। उसके बिंब जोड़ने वाले बनने से पहले शारीरिक रूप से तोड़ने वाले हैं, ऐसी जटिलता जो पुनर्मिलन की भावुक व्याख्या में आसानी से छूट सकती है।
सौहार्द निरंतर अभ्यास की ओर देखता है
III.30 समय की तीसरी दिशा देता है। वह गृहस्थी के मन, वाणी, भोजन, काम और सद्भाव साझा होने की कामना करता है। मंत्र 5 और 6 मिलकर खींचने और पीने का स्थान साझा करने का चित्रण करते हैं, ऐसी क्रियाएँ जिन्हें एक बार याद करने के बजाय जारी रखना होता है। सूक्त स्मृति का सहायक नहीं है और अपने संदर्भ की पारिवारिक भूमिकाएँ साथ लाता है। फिर भी वह उन तीन बातों को अलग करने में मदद करता है जिन्हें आधुनिक प्रेम-अनुष्ठान मिला सकता है: पैदा किया गया कामना का उफान, बिछोह के बाद पुनर्मिलन और संबंध की रोज़ की देखभाल। पाठ किसी को अतीत सँजोने के लिए प्रेरित करने की एक सामान्य तकनीक नहीं देते; वे अलग सामाजिक समस्याएँ और वांछित परिणाम प्रस्तुत करते हैं।
परियोजना के लिए रचा गया स्मरण
“किसी लक्षित व्यक्ति को हमारा सबसे सुखद पल याद दिलाना” और “सुखद स्मरण” आधुनिक कल्पनात्मक रचनाएँ हैं। उद्धृत सूक्तों में से कोई साझे चित्र, वर्षगाँठ, सैर या दूसरे व्यक्ति के मन की पुष्ट स्मृति का नाम नहीं लेता। फिर भी आज के पाठक को तुलना स्पष्टता दे सकती है। यदि चाहा गया पल वास्तव में साझा था, तो उसकी कहानी सुनाना फिर बातचीत खोल सकता है; यदि दोनों ने उसे सुखद नहीं पाया था, तो प्रेम का कोई प्राचीन मंत्र साझा स्मृति स्थापित नहीं करता। यह आज की व्याख्या का प्रश्न है, ऐसा प्रभाव नहीं जिसका प्राचीन पाठ वादा करता हो। VI.130 की असमान कामना विशेष रूप से इस धारणा से सावधान करती है कि जो एक व्यक्ति याद दिलाना चाहता है, दूसरे के लिए भी वही मूल्यवान है।
उदाहरण सहित व्याख्या
समय की तीन दिशाएँ
VI.130.1 को अभी कामना भेजने की प्रार्थना, VI.139.5 को बिछड़े प्रेमियों के फिर मिलाए जाने का बिंब और III.30.6 को चलती हुई गृहस्थी में लोगों के भोजन तथा उपासना साझा करने के दृश्य के रूप में पढ़ें। पहला तत्काल परिवर्तन की, दूसरा बिछोह दूर होने की और तीसरा जारी रहने वाले क्रम की कल्पना करता है। कोई भी प्रिय व्यक्ति से अतीत की किसी खास दोपहर को याद करने को नहीं कहता। तुलना सुखद समय वाले आधुनिक मुख्य पद को प्रेम के अलग प्राचीन अर्थ निगल जाने से रोकती है। वह इस साधारण तथ्य के लिए भी जगह रखती है कि एक ही पल के दो लोगों के विवरण अलग हो सकते हैं।
